प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 38)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 38) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप
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'संसरतीति संसार:', 'गच्छतीति जगत्' के अनुसार नित्य गतिशील का नाम ही संसार है । संसार माया से बना है । माया एक ईश्वरीय अनादि शक्ति है । वेद कहता है -
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
तस्यावभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥ (श्वेता. 4-10)
अर्थात् माया खिलवाड़ या वहम नहीं है, अपितु एक शक्ति है ।
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वी: प्रजा: सृजमानां सुरूपा: |
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्य: || (श्वेता. 4-5)
इस वेदमंत्र के अनुसार एवं 'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया', इस गीतोक्ति के अनुसार 'सोदासी रघुवीर की समुझे मिथ्या सोपि', इत्यादि रामायण के अनुसार, माया ईश्वरीय शक्ति है । इसी से यह संसार बना है । अतएव मन एवं सांसारिक पदार्थ सजातीय होने के कारण एक दूसरे के सहयोगी हैं । ईश्वर दिव्य है, अतएव मन का आकर्षण स्वभावत: ईश्वर की ओर नहीं होता ।
अब आप संसार के सूक्ष्म एवं स्थूल रूप पर विस्तृत मीमांसा करें, क्योंकि यहाँ पर ही मन अटका हुआ है एवं बुद्धि का भी यह निश्चय सा बना हुआ है कि संसार में सुख अवश्य है एवं अवश्य मिलेगा तभी तो हम तदर्थ प्रतिक्षण प्रयत्नशील हैं ।
संसार दो प्रकार का होता है, एक वासनात्मक संसार, दूसरा स्थूल संसार । वासनात्मक संसार उसे कहते हैं जो प्रत्येक अंतःकरण में, अनादिकालीन संस्कारों के द्वारा, स्थूल संसार के पदार्थों की वासना के रूप में रहता है । स्थूल संसार उसे कहते हैं जो उस वासनात्मक जगत् का विषय स्वरूप है । इन दोनों में सूक्ष्म वासनात्मक जगत् बलवान् है, क्योंकि यदि स्थूल पदार्थ नहीं भी होते तो भी यह वासनावाला जगत् चिन्तन द्वारा अपना कार्य करता है । मान लीजिये, एक पति-परायणा स्त्री का पति इंग्लैण्ड में है, फिर भी वह दिन-रात उसके वियोग की ज्वाला में रहती है । किन्तु यदि स्थूल जगत् भी होता है तब वासना-जगत् और भी बलवान् हो जाता है । ऐसा भी होता है कि स्थूल पदार्थ का साक्षात्कार होते ही सूक्ष्म संसार वासना-रूप में स्वयं प्रकट हो जाता है । इसका प्रमुख विज्ञान यह है कि अन्तरंग वासना नित्य अंतःकरण में रहती है । कभी-कभी तो वासना बिना स्थूल पदार्थ के ही बलवान् होकर अशान्त कर देती है एवं कभी-कभी अन्तरंग वासना का भान न होते हुए भी स्थूल पदार्थ के दर्शनादि से वासना प्रकट हो जाती है । फिर भी यह तो अनुभवसिद्ध बात है कि अन्तरंग वासना बाह्य स्थूल पदार्थ के अभाव में भी बलवान् होकर दुःखी किया करती है । किन्तु यदि अन्तरंग वासना किसी प्रकार समाप्त कर दी जाय तो बाह्य स्थूल पदार्थ किंचित् भी अशान्त नहीं कर सकते । अशान्ति पदार्थों से तभी तक होती है जब तक उन-उन पदार्थों की वासना अन्तःकरण में विद्यमान रहती है । अतएव प्रमुख स्थान वासना को ही दिया है । यदि वासना का अत्यन्ताभाव हो जाय तो बाह्य जगत् के पदार्थ होते हुए भी न होने के बराबर रहेंगे ।
इतना अवश्य है कि यदि बुद्धि में यह निश्चय हो जाय कि बाह्य जगत् के पदार्थों में अपना परमानन्द प्राप्ति का प्रयोजन हल न होगा तो अन्तरंग वासना स्वयमेव समाप्त हो जायगी । अतएव सर्वप्रथम बुद्धि के द्वारा यह विचार एवं निश्चय जमाना है कि संसार में कुत्रापि आनन्द नहीं है ।
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