प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 57)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 57) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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देखो, जैसे प्रथम दूध से मक्खन निकाल लिया जाता है, तब मक्खन पानी को चैलेञ्ज कर सकता है कि हम पानी में रहकर भी उससे पृथक् रहेंगे । किन्तु, यदि दूध ने मक्खन बनने से पूर्व ही चैलेञ्ज कर दिया और पानी में कूद पड़ा तो अपने आपको खो बैठेगा, अर्थात् पानी में घुल-मिल जायेगा । उसी प्रकार जब एकांत में, संसार के पदार्थों से पृथक् होकर आवश्यकता की पूर्तिमात्र के हेतु सामान रखकर, साधना द्वारा मन ईश्वर में जमा लें, ईश्वरीय प्रेमरस प्राप्त हो जाय, तब विषयानन्द को चैलेञ्ज कर सकते हैं । यह ठीक है कि बालक रसगुल्ला को बिना देखे ही रोता है किन्तु यदि सामने रखा हो तब तो जमीन आसमान एक कर देगा । यह पूर्व में बताया गया है कि वास्तविक विषय-सामग्री पाकर वासना उद्दीप्त होती है ।
अतएव संसार सम्बन्धी ऐश्वर्य जितने कम हों, उतना ही अच्छा और उतने में भी मन की आसक्ति न हो तब तो साधना हो सकती है अन्यथा रंक एवं सम्राट सब बराबर ही रहेंगे । जिसके पास एक कपडा नहीं है, वह एक कपड़े के लिए परेशान है, जिसके पास 50 कपड़े हैं वह 51 वें के लिए परेशान है । परेशानी में कोई अन्तर नहीं पड़ता । इस संसार में ४ प्रकार के लोग मिलते हैं -
(1) कुछ लोग संसार के मदवर्धक ऐश्वर्यों के होते हुए भी ईश्वर के रस में विभोर रहते हैं ।
(2) कुछ लोग संसार के मदवर्धक पदार्थों के न होते हुए भी संसार के ही ऐश्वर्यों के चिन्तन एवं उनके पुन: संग्रह में अशान्त रहते हैं ।
(3) अधिकांश लोग संसार के मदवर्धक ऐश्वर्यों के होने के कारण ईश्वर से वंचित होकर, मदोन्मत्त बने हुए संसार की ही ओर बढ़ते जाते हैं ।
(4) अधिकांश लोग संसार के मदवर्धक पदार्थों के अभाव के कारण संसार से निराश होकर ईश्वर की शरण में जाते हैं एवं सत्संग द्वारा संसार का रूप समझ कर उससे विरक्त हो जाते हैं ।
इसमें प्रथम वर्ग के लोगों के उदाहरण बहुत कम मिलेंगे क्योंकि मदवर्धक पदार्थों के रहने पर भी उनमें आसक्ति न हो, उनका मद न हो, यह योगभ्रष्ट संस्कारी अर्थात् उच्चकोटि आध्यात्मिक पुरुष ही कर सकता है ।
दूसरे वर्ग के भी उदहारण कम मिलेंगे क्योंकि संसार के अभाव में संसार का अहंकार न होने के कारण स्वभावत: मन ईश्वर में जाना चाहिये । किन्तु फिर भी घोर कुसंस्कार एवं कुसंग के परिणामस्वरूप ऐसा होता है । तीसरे एवं चौथे वर्ग के लोगों का नियमित रूप ही है । वास्तव में वही नियम सार्वजनिक है ।
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