प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 65)
✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 65) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿
एक बात स्मरण रहे कि महापुरुष या गुरु-तत्त्व से यह अभिप्राय नहीं है कि जो केवल शास्त्रवेद का विद्वान-मात्र हो अथवा अनुभवीमात्र हो । आप्त ग्रंथों ने दोनों ही बातों को प्राधान्य दिया है । यद्यपि मेरी राय में यदि शास्त्र वेद का विद्वान् नहीं भी है तो भी अनुभवी महापुरुष से काम बन सकता है क्योंकि उसके जान लेने पर सब कुछ स्वयमेव ज्ञात हो जाता है । आप्त ग्रंथों एवं लोक में तीन शब्द पढ़ने सुनने में आते हैं - एक पुरुष, दूसरा महापुरुष एवं तीसरा परमपुरुष । दूसरे शब्दों में इन्हीं तीनों को जीवात्मा, महात्मा एवं परमात्मा शब्दों से पुकारा जाता है । हमें महापुरुष या महात्मा तत्त्व पर विचार-विनिमय करना है । वास्तव में जीवात्मा एवं परमात्मा अथवा पुरुष एवं परमपुरुष के मध्य स्थिति का नाम ही महात्मा या महापुरुष है । अर्थात् जिस जीवात्मा या पुरुष ने परमात्मा या परम पुरुष को जान लिया हो, देख लिया हो,उसमें प्रविष्ट हो चुका हो, वही महात्मा या महापुरुष है । भावार्थ यह कि ईश्वर-प्राप्त जीव को ही महापुरुष कहते हैं ।
किन्तु, किस जीव ने ईश्वर-प्राप्ति की है, यह जानना अत्यंत कठिन है । यद्यपि ईश्वर की भाँति, उससे एकत्व प्राप्त किये हुए महापुरुष को जानना केवल उसी कक्षा के महापुरुष के लिये संभव है क्योंकि जिस प्रकार ईश्वर प्राकृत इन्द्रिय, मन, बुद्धि से अग्राह्य है, उसी प्रकार महापुरुष भी प्राकृत इन्द्रिय, मन, बुद्धि से अग्राह्य है, फिर भी कुछ प्रत्यक्ष, कुछ अनुमान, कुछ शब्द प्रमाण के द्वारा महापुरुष को पहिचानना ही पड़ता है, अन्यथा तो अनादि-काल से अब तक किसी को भगवत्प्राप्ति ही न हुई होती ।
अतएव महापुरुष के पहिचानने में परिश्रम एवं समय भले ही लगे, उसके बिना ईश्वर-प्राप्ति का प्रश्न नहीं हल हो सकता । यदि सच पूछा जाय तो जैसे ए, बी, सी, डी पढ़ने वाले विद्यार्थी का प्रोफेसर की योग्यता का निर्णय करना हास्यास्पद है, वैसे ही एक आध्यात्मिक विद्यार्थी शिष्य का पूर्ण आध्यात्मिक पुरुष 'गुरु' का निर्णय भी उपहासजनक है । किन्तु, फिर भी अनन्तानन्त शिष्यों ने गुरु को पहिचाना है, शरणापन्न हुए हैं, उनकी बताई साधना के द्वारा एवं उनके सहयोग से ईश्वर-प्राप्ति की है । अतएव उसी नियम एवं मार्ग से हमें भी वहाँ पहुँचना है, निराश नहीं होना है । जब कोई कर्म एक व्यक्ति कर सकता है तो फिर इसे कोई भी कर सकता है, यह सिद्ध हो जाता है ।
✨✨✨✨✨✨✨✨✨
Comments
Post a Comment