प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 62)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 62) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

वैराग्य का स्वरूप (contd.)
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कुछ लोग कहते हैं कि व्यर्थ में वैराग्य के चक्कर में क्यों पड़ा जाय, सीधे-सीधे ईश्वर में अनुराग करो बस, वैराग्य अपने आप हो जायगा । किन्तु विचारणीय यह है कि ईश्वर में अनुराग करोगे किससे एवं किसलिए करोगे ? उत्तर यही मिलेगा कि मन से अनुराग करेंगे और चूँकि ईश्वर में सुख है और सुख ही हमारा अभीष्ट है, इसलिये अनुराग करेंगे । परन्तु बुद्धि तत्क्षण खंडन कर देगी कि चलो हम मान लेते हैं कि ईश्वर में सुख होगा किन्तु संसार में भी तो सुख है । इतना ही नहीं, संसार  करतलगत है, प्रत्यक्ष है, अनुभूत है, उसे छोड़कर अन्धेरे में क्यों पड़ें? तब फिर मन का अनुराग ईश्वर में कैसे होगा? कहना सुगम है, करना कठिन हुआ करता है । ऐसे भोले विचारक सोचें कि मरुस्थल के उड़ते हुए बालू के  कणों को, सूर्य  के प्रकाश में देखकर हिरन को यह विश्वास हो जाता है कि वहाँ पानी अवश्य है, वह मर कर भी अपने विश्वास को नहीं छोड़ता, उसी प्रकार 'संसार में सुख है', यह विश्वास जब तक बुद्धि में जमा है, अनन्तबार मर कर भी हम अपना निश्चय नहीं बदल सकते । यही आशा बनी रहेगी कि अब सुख मिलेगा, अब सुख मिलेगा । 

अतएव यह कहना अपने आपको धोखे में डालना मात्र है कि सीधे मन भगवान् में लगा दो, बस,सब काम ठीक हो जायगा । मन लगाने वाला कौन होगा ? आप जानते हैं मन का शासक कौन है? -

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् पर:।   (कठो. 1-3-10)

 वेदवाक्य के अनुसार मन की शासिका बुद्धि है । जब बुद्धि का ही निश्चय दूसरा है तो मन को ईश्वर में कौन लगाने देगा? क्या मन अपने आप ईश्वर में लग जायगा ? यह तो सर्वथा असम्भव है । अगर आप कहें कि श्रीकृष्णावतार में कितने उदहारण ऐसे हैं जिन्होंने श्रीकृष्ण को देखा और बस, विभोर हो गये, पर आप शायद यह नहीं जानते कि श्रीकृष्ण का वह विभोर करने वाला, चिन्मय स्वरूप कौन देख सकता है । 
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