प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 68)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 68) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿
सत्य युग में उन्हीं ब्रह्मा के पुत्र एवं जीवन्मुक्त अमलात्मा परमहंसो के नेता सनकादि चार भाई हुए हैं । इनका आख्यान आपने सुना होगा कि एक बार चारों भाई वैकुण्ठ में जा रहे थे तो जय-विजय, वहाँ के पार्षदों ने इन्हें रोक दिया, जिससे इन्होंने क्रोध में आकर शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ । भला सोचिये, ब्रह्मलीन परमहंस तो उसे कहते हैं जो अपने सिवाय न कुछ देखता हो, न कुछ सुनता हो, न सूँघता हो, न स्पर्श करता हो, न रस लेता हो, न सोचता हो, न निश्चय करता हो । वेद कहता है -
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति, तदितर इतरं पश्यति, तदितर इतरं शृणोति, तदितर इतरमभिवदती, तदितर इतरं मनुते, तदितर इतरं विजानाति । यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन क्ँ शृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कं मन्वीत त्तत्केन कं विजानीयात् । येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन विजानीयात्। (बृहदारण्यको. 2-4-14)
तो ऐसे परमहंस को द्वैत का भान कैसे हुआ ? पुन: अज्ञान कैसे आया, शाप कैसे दिया ? इत्यादि । आप शंकरीय महाशक्ति पार्वतीजी का आख्यान पढ़कर ही विक्षिप्त हो जायेंगे । देखिये, रामायण में लिखा है, जिस समय भगवान् राघवेन्द्र सरकार अपनी ह्लादिनी-शक्ति जगदम्बिका सीताजी की खोज में विरह का अभिनय करते हुए जा रहे थे, उसी समय पार्वतीजी ने उन्हें देखा । साथ में शंकरजी भी थे । पार्वतीजी को अज्ञान ने धर दबाया । अस्तु, पार्वतीजी ने कहा ।
कबहूँ योग वियोग न जाके । देखा प्रगट विरह दुःख ताके ॥
अर्थात् भगवान् तो उसे कहते हैं जिसे न योग हो न वियोग हो अर्थात् अपने स्वरूप में आनन्दमय रहे । यह कैसे भगवान् हैं जो किसी स्त्री के वियोग का अनुभव कर रहे हैं और मैं प्रत्यक्ष देख रही हूँ । साथ ही वे यह भी कहती हैं -
शंकर जगत वन्द्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ।
तिन नृप सुतहिं कीन्ह परनामा । कही सच्चिदानन्द परधामा ॥
अर्थात् शंकरजी जगद्वन्द्य जगदीश हैं, उन्होंने सच्चिदानन्द ब्रह्म कहते हुए इन्हें प्रणाम किया है । यहाँ पर ध्यान दीजिये कि जगदीश शब्द का प्रयोग, वेदों के अनुसार, ईश्वर के लिये होता है।
भावार्थ यह कि पार्वतीजी शंकरजी को भगवान् मानती हैं किन्तु उनके प्रणाम पर भी विश्वास नहीं हुआ और तर्क यह रखा कि -
ब्रह्म जो व्यापक विरज अज अकल अनीह अभेद ।
सो कि देह धरि होय नर जाहि न जानत वेद ॥
अर्थात् निराकार व्यापक ब्रह्म भला कहीं साकार हो सकता है ? अब सोचिये कि इस प्रकार की शंका तो देहाती गंवार को भी न होगी क्योकि सब जानते हैं कि जीव निराकार है किन्तु साकार शरीर लिये 84 लाख योनियों में चक्कर लगा रहा है । फिर सर्वसमर्थ भगवान्, जिसके मुस्कराने मात्र से साकार विश्व का निर्माण हो सकता है, वह स्वयं साकार नहीं हो सकता, यह सोचना कितना हास्यास्पद है ।
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