प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 77)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 77) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

इसके अतिरिक्त यह भी जान लेना चाहिये कि महापुरुष जिस क्षण में महापुरुष बनता है, उसी क्षण में प्रथम उसे दिव्य शक्ति स्वयं ईश्वर प्रदान कर देता है । गीता के अनुसार -

तेषां सततयुक्तानं भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ (गीता 10-10)

इसी बुद्धियोग को पाकर जीव भगवान् को देख सकता है । इतना ही नहीं, असीम शक्ति ईश्वर न दे तो ईश्वरीय अनन्त आनन्द को मानव सहन भी नहीं कर सकता । अरे, ईश्वरीय आनन्द तो दूर की बात है, अगर स्वर्गीय आनन्द भी किसी मृत्युलोक जीव को सहसा मिल जाय तो वह मर जायगा ।  फिर अनन्त आनंद को सहन करने की शक्ति प्राकृत सान्त इन्द्रिय मन-बुद्धि में कहाँ है? अतएव दिव्य-शक्ति-प्राप्त महापुरुष के सभी कर्म दिव्य ही होंगे । इसमें सन्देह का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता ।

यदि कोई कहे कि ईश्वर गलत कार्य क्यों करता है तो यह प्रश्न ही भोलेपन का है, क्योंकि जब ईश्वर का कोई स्वार्थ नहीं अतएव किसी से रागद्वेष नहीं, पुन: सदा आनन्दमय है, सर्वज्ञ है, तब इसका प्रयोजन केवल परोपकार ही हो सकता है । उसकी किसी क्रिया का कारण जीव-कल्याण ही है, हम भले ही उसके कार्यों को सीमित बुद्धि के कारण न समझ सकें ।

यदि कोई दावा करे कि ईश्वरीय कार्यों को हम क्यों नहीं समझ सकते तो इसका उत्तर मै ईश्वर के प्रकरण में समझा चुका हूँ । ईश्वर दिव्य है, हम मायिक हैं; ईश्वर असीम है, हम ससीम हैं; ईश्वर सर्वशक्तिमान है, हम अशक्त हैं; ईश्वर प्रेर्य है, हम प्रेरक हैं; ईश्वर प्रकाशक है, हम प्रकाश्य हैं; ईश्वर मायाधीश है, हम मायाधीन हैं । भावार्थ यह कि ईश्वर या उसके कार्य हमारी प्राकृत, सीमित, सदोष इन्द्रिय-मन-बुद्धि में नहीं आ सकते । उसी से सम्बद्ध महापुरुष है, अतएव उसके भी कार्य ईश्वरीय होने के कारण हमारी समझ में नहीं आ सकते । अस्तु, इतना तो समझ ही गये होंगे कि भले ही वह समझ में न आये परन्तु दिव्य एवं सत्य ही है । ईश्वर या महापुरुष की बात जाने दीजिये, मैं आपको संसारी क्षेत्र में ही बताऊँ कि 6 वर्ष का भोला बालक अपनी माँ एवं बाप से पूछता है कि मैं किसका लड़का हूँ? दोनों कहते हैं कि हमारे लड़के हो । लड़का सोचता है कि इन दोनों में कोई न कोई अवश्य झूठा है । पुन: अपने अन्य गुरुजनों से पूछता है । सब कहते हैं कि तुम अपने माँ-बाप दोनों के बेटे हो । जब लड़का पूछता है कि यह कैसे हो सकता है तब कोई भी समझाने में समर्थ नहीं हो पाता क्योंकि लड़का काम दोष से अपरिचित है । पश्चात् वह लड़का कई लड़कों की मीटिंग करता है और कहता है कि इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया और यह  बहाना किया गया कि तुम अभी नहीं समझ सकते । क्यों बच्चों ! मेरी राय में तो यह सब धोखे की बातें हैं न ? भला हम लोग क्यों नहीं समझ सकते ? सब बातें तो समझ लेते हैं । वास्तव में या तो हम माँ के पुत्र होंगे या बाप के, बस ।

अब सोचिये जब काम दोष से अपरिचित बालक को काम सम्बन्धी विषय का ज्ञान कराना महत्तम बुद्धिमान के लिए भी सर्वथा असम्भव है, तो फिर कामादि दोष से युक्त व्यक्ति को कामादि से परे वाले एवं दिव्य ईश्वरीय शक्ति वाले कार्यों को समझाना कैसे संभव हो सकता है, भले ही वह भोले बालक की भाँति यह कह दे कि भला हम क्यों नहीं समझ सकते, समझाना ही नहीं आता, सब धोखा है, हम कभी भी नहीं मानेंगे, इत्यादि ।
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