प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 74)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 74) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿
वास्तव में, महापुरुष उसे कहते हैं जो कुछ न कर सके, न शुभ कर्म कर सके, न अशुभ कर्म कर सके । यदि एक भी कर्म एक क्षण के लिये भी कर सकता है तो वह महापुरुष नहीं हो सकता । गीतोक्ति के अनुसार -
यस्त्वात्मतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव: ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ (गीता 3-17)
अर्थात् जो महापुरुष हो जाता है, उसके कार्य समाप्त हो जाते हैं । जैसे अंकुर उत्पन्न होने पर बीज समाप्त हो जाता है, फल उत्पन्न होने पर फूल समाप्त हो जाता है, वैसे ही कृत-कृत्य महापुरुष हो जाने पर कृत्य समाप्त हो जाते हैं । जैसे-जैसे ईश्वर की और बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे शुभाशुभ कर्म समाप्त होते जाते हैं एवं जब पूर्णतया ईश्वर के पास पहुँच जाता है तो समस्त कर्म समाप्त हो जाते हैं । यों समझिये कि गर्भिणी माता प्रतिमास कार्य कम करती जाती है एवं प्रसूति के समय सब कर्म बंद हो जाते हैं ।
मीमांसादि दर्शन-शास्त्रों का इतना कार्य है कि ये ईश्वर से मिले दें । पश्चात् वे शास्त्र-वेद वापस लौट आते हैं । फिर महापुरुष उनका दास नहीं रहता । मीमांसा-शास्त्र-विहित निष्काम कर्म करके अंतःकरण शुद्धि हो जाती है, पश्चात् वेदान्त का श्रवण करता है, पश्चात् न्याय, वैशेषिक शास्त्रों से मनन करता है, पश्चात् सांख्य एवं योग दर्शनों से निदिध्यासन करता है, पश्चात् भगवत्प्राप्ति हो जाती है । पुन: शास्त्रों का कर्म अपेक्षित नहीं होता । कुछ महापुरुष लोक-आदर्श के लिये शुभ कर्म करते दिखाई पड़ते हैं एवं कुछ उच्छृंखल से दिखाई पड़ते हैं, जो अभी स्पष्ट हो जायेगा ।
अब आप यह समझ गये होंगे कि महापुरुष क्यों कुछ कर्म नहीं कर सकता । स्थूल बुद्धि से भी यह समझ में आ सकता है कि कर्म का जो अन्तिम लक्ष्य है, उसके पा लेने पर कर्म स्वयं निवृत्त हो जाता है ।
दूसरी बात यह भी है कि कोई भी व्यक्ति यदि शुभाशुभ कर्म करे तो बंधन हो जाता है, तो फिर भला कृतार्थ हो जाने पर पुन: कर्म कैसे करे और क्यों करे ?
तीसरी बात यह कि जैसे मैंने पूर्व में बताया था, ईश्वर माया का प्रेरक है, माया जीव की प्रेरक है, जीव बुद्धि का प्रेरक है । बुद्धि मन की प्रेरक है, मन इन्द्रियों के विषयों का प्रेरक है एवं इन्द्रियों के विषय इन्द्रियों के प्रेरक हैं । जब जीव एवं ईश्वर का मिलन हो जाता है तब उन दोनों के मध्य में रहने वाली माया पृथक् हो जाती है, अब ईश्वर डायरेक्ट (direct) जीव का प्रेरक हो जाता है एवं जीव बुद्धि आदि का हो जाता है । जब जीव जो कुछ करता दिखाई पड़ता है वह ईश्वरीय प्रेरणा का परिणाम-मात्र है । जीव का परमानन्द-प्राप्ति पर्यन्त ही स्वार्थ था, जब वह पूरा हो गया तो फिर उसे अब क्या करना है ? यही कारण है कि प्रत्येक महापुरुष के कार्य ईश्वरीय होने के कारण वन्दनीय हैं । अब ईश्वर कोई शुभ या अशुभ कर्म उससे क्यों कराता है, इसका प्रयोजन वही जाने ।
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