प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 71)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 71) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿
नारदजी के विषय में आप जानते ही हैं कि कामदेव को जीत लेने पर भगवान् के पास अहंकार लेकर गये और भगवान् ने माया द्वारा उनको बंदर का मुँह देकर खिलवाड़ किया । अब रामावतार के समय और क्या-क्या हुआ, ज़रा वह भी देखिये ।
हनुमानजी महाराज, जिनसे बड़ा भक्त उस युग में किसे माना जाय, ऐसे रोम-रोम में राम रमाये हुए हनुमान जी ने भी राम को नहीं पहिचाना । ब्राह्मण का वेश बनाकर वनवासी लीलाधारी भगवान् राम के पास गये और पूछा, तुम कौन हो ? यहाँ कहाँ घूम रहे हो ? तुम ब्रह्मा, विष्णु या शंकर हो या नर नारायण हो ?
की तुम तीन देव महँ कोऊ । नर नारायण की तुम दोऊ ॥
अर्थात् मैं तुम्हें नहीं पहिचान पा रहा हूँ । कृपा करके बताओ । भगवान् राम ने अभिनय के अनुसार कहा कि इनमें से मैं कोई नहीं हूँ । मैं तो राजा दशरथ का पुत्र हूँ । यहाँ मेरी श्रीमती जी खो गयी हैं, उन्हें ढूँढ रहा हूँ । पुन: राम ने पूछा, तुम कौन हो ? तब हनुमान जी ने पहिचाना और कहा -
मोर न्याउ मैं पूछा साईं । तुम कास पूछहु नर की नाईं ॥
तव मायावश फिरउँ भुलाना । ताते नाथ न मैं पहिचाना ॥
अर्थात् मैं तो माया के चक्कर में आ जाता हूँ, पर तुम तो मायाधीश हो ।
भगवान् राम का अनन्य एवं अद्वितीय सखा सुग्रीव भगवान् राम की परीक्षा ले लेने के पश्चात् भी राज्य पाने पर भगवान् राम को भूल जाता है । जब लक्ष्मणजी धमकी देते हैं तब उसे स्मरण आता है । इतना ही नहीं, वही सुग्रीव अपनी भाभी तारा का स्त्री रूप में वरण करता है कि जिस राम के आदर्श में लक्ष्मणजी ने सीताजी के चरणों को ही देखा था, अन्य अंग देखे ही न थे -
नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् । (वा. रा.)
अर्थात् मैं सीताजी के नूपुर ही पहिचानता हूँ क्योंकि उनके चरणों में नित्य प्रणाम किया करता था । ऐसे आदर्श स्वरूप में सुग्रीव का भाभी को पत्नी बनाना कितना चकित कर देने वाला है । यही कार्य विभीषण ने भी किया, अपनी भाभी मंदोदरी को स्त्री बना लिया । इतना ही नहीं, जब विभीषण पूर्णतया शरणापन्न होकर भगवान् के पास आया था तब उसके आने पर सुग्रीवादि ने बड़ी आपत्ति की थी, तब भगवान् ने यहाँ तक कहा था कि -
'विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावण: स्वयम्' (वा. रा.)
अरे सुग्रीव ! विभीषण तो शरणागत है, यदि रावण भी आवे तो कोई आपत्ति नहीं है । मैं उसे भी स्वीकार करूँगा, भले ही विभीषण को लंकेश की उपाधि दे दी है और अब रावण को अवधेश बनाना पड़े ।
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