प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 66)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 66) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

प्राय: दो प्रकार के महापुरुष प्राप्त होते हैं एवं दो ही प्रकार के दंभी भी होते हैं । इन चारों को समझ लेने पर ही महापुरुष की समस्या हल लो सकती है । 

(1) महापुरुष उसे कहते हैं जिसके भीतर भी महापुरुषत्व हो अर्थात् ईश्वर का वास्तविक ज्ञान, दर्शनादि अनुभव हो एवं बाहर भी उसी रूप में दीखता हो । वह विपरीत अभिनय न करता हो । ऐसे महापुरुष को पहिचानने में सुविधा है । किन्तु यह असंभव सा है, क्योंकि महापुरुषों का इतिहास इसके विपरीत है । 

(2) दूसरे महापुरुष वे होते हैं जो भीतर से तो वास्तव में ही महापुरुष होते हैं किन्तु बाह्य व्यवहार में सांसारिक से दीखते हैं । हम लोग बाह्य व्यवहार से ही व्यक्ति का निर्णय करते हैं, इसलिए ऐसे महापुरुष को पहिचानना अति कठिन हो जाता है और प्राय: ऐसे ही महापुरुष होते हैं । कुछ उन लोगों का स्वभाव सा होता है कि - *'गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नत:'*

अर्थात् अपने आपको जगत से छुपाकर रखना । इसका रहस्य यह प्रतीत होता है कि यदि महापुरुष स्पष्ट बता दें कि मैं महापुरुष हूँ तो शायद जनता उनके पास भी न जाय क्योंकि जनता यह समझती है कि जो अच्छा आदमी होता है, वह अपने मुँह से अपने आपको अच्छा नहीं कहता अथवा अन्य कोई भी कारण हो किन्तु हमारे इतिहास में ऐसे ही महापुरुष हुए हैं, जिनका बहिरंग व्यवहार मायिक था एवं अन्तरंग दिव्य था । 

(3) एक मायिक पुरुष (दंभी) उसे कहते हैं जो भीतर से दंभी हो एवं बाहर से भी दंभी ही हो अर्थात् वह मायिक व्यक्ति बाहर भी महापुरुष का अभिनय न करता हो, वेशभूषा आदि से पृथक् हो तथा सर्वसाधारण की भाँति ही रहता हो, ऐसे दम्भी को पहिचानना सरल है । 

(4) दूसरे मायिक पुरुष (दम्भी) वे हैं जो भीतर से तो मायिक हैं किन्तु बहिरंग व्यवहार महापुरुषों सरीखा बनाये रहते हैं । जैसे, शास्त्र वेद का उपदेश करते हैं, वेश भी साधुओं का सा बनाये हुए हैं, शिष्यादि परम्परा भी स्थापित किये हैं । ऐसे दम्भी महापुरुष को पहिचानना अत्यन्त कठिन है क्योंकि हम लोग प्राय: व्यवहार से ही व्यक्ति का निर्णय करना जानते हैं । 

अस्तु, द्वितीय एवं चतुर्थ इन दोनों पर गम्भीर विचार करना है । अर्थात् जिसके भीतर महापुरुषत्व है किन्तु बाहरी व्यवहार संसारी है और जिसके भीतर संसार है किन्तु बाह्य व्यवहार सन्तों का सा है, इन दोनों को कैसे जाना जाय । बस, यही एक गम्भीर समस्या है । आप कहेंगे, यदि कोई भीतर से महापुरुष होगा तो वह बाहर से मायिक हो ही नहीं सकता, किन्तु शायद आपने इतिहास का गम्भीर अध्ययन नहीं किया । आइये, आपको थोड़ा दिग्दर्शन करा दिया जाय । 
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