प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 72)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 72) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

कैकेयी के प्रति सभी अयोध्यावासियों की दुर्भावना हो गयी थी, जब कि भगवान् राम ने अपने मुख से कहा था कि जो कैकेयी में दुर्भावना लायेगा, वह मेरा स्वजन नहीं है और विलक्षणता यह कि अयोध्या में उस समय एक भी मायिक जीव नहीं था । 

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज्य नहिं काहुहिं व्यापा ॥ 

त्रिताप किसी को व्याप्त नहीं हुआ, अपरंच -

जेहि सुख लागि पुरारि, असुभ वेष कृत सिव सुखद । 
अवधपुरी नरनारि, तेहि सुख महँ संतत मगन ॥ 

सभी मायातीत जीव थे । भरतजी का कैकेयी के प्रति जो शब्द प्रयोग हुआ था, वह भी सर्वविदित है । इतना ही नहीं, माता कैकेयी की भरतजी महाराज हत्या कर देने का एलान कर रहे हैं, बर्शते कि उन्हें कोई विश्वास दिला दे कि इस कृत्य से भगवान् राम उनका परित्याग नहीं करेंगे -

हन्यामहमिमां पापां कैकेयीं  दुष्टचारिणीम् ।  (वा. रा. ) 

अब कृष्णावतार के महापुरुषों पर विचार कीजिये, जिन ब्रजगोपों एवं गोपियों के विषय में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा कहते हैं -

तदस्तु मे नाथ स भूरिभागो भवेऽत्र वान्यत्र तु वा तिरश्चाम् । 
येनाहमेकोऽपि भवज्जनानां भूत्वा निषेवे तव पादपल्लवम् ॥ (भाग. 10-14-30)

अहो भाग्यमहोभाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम् । 
यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णंब्रह्म सनातनम् ॥  (भाग. 10-14-32)

तद्भूरिभाग्यमिहजन्मकिमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमांघ्रिरजोऽभिषेकम् । 
यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्दस्त्वद्यापि यत्पदरज: श्रुतिमृग्यमेव ॥ (भाग. 10-14-34)

अर्थात् इन गोपों एवं गोपियों की चरणधूलि पाने के लिए यदि मैं ब्रज में पक्षी आदि हो जाता तो भी अपना भूरिभाग्य मानता ।
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