प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 61)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 61) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

वैराग्य का स्वरूप (contd.)
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आप लोग सोचते होंगे, जब मन संसार में राग-द्वेष रहित, अलग हो जायगा तब फिर क्या करना अवशिष्ट रह जायगा ? क्योंकि तब तो वासना का निर्माण ही न होगा । जब वासना का निर्माण न होगा तो उसकी पूर्ति में लाभ या अपूर्ति में क्रोधादि की उत्पत्ति ही न होगी, तब फिर अशान्ति या दुःख ही कैसे आ सकेंगे ? फिर शरणागति करने का व्यर्थ प्रयास क्यों किया जाय ?

किन्तु, यह सोचना भोलापन है । क्योंकि, एक तो मन विरक्त होकर वासना न बनावे यह असंभव है क्योंकि जब तक परमानन्द न प्राप्त हो जायगा, उसकी स्वाभाविक वासना सदा रहेगी ही । 

दूसरी बात यह कि राग द्वेष रहित मन क्या निश्चेष्ट पड़ा रहेगा, अर्थात् अपनी क्रिया बन्द कर देगा ? यह तो सर्वथा असंभव है, क्योंकि कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्ता नहीं रह सकता, यह मैं पूर्व में ही सिद्ध कर चुका हूँ । 

तीसरा कारण यह है कि अनन्तानन्त जन्मों के संस्कारों के कारण भी वासना की उत्पत्ति स्वाभाविक है, उसे कोई नहीं रोक सकता । 

चौथा कारण यह भी है कि जब तक माया का आधिपत्य जीव पर रहेगा, तब तक मायिक-वासना बनाना, यही जीव का स्वभाव होगा । 

पाँचवा कारण यह है कि ईश्वर प्राप्ति से ही जीव की कामना पूर्ति हो सकती है, उसके पूर्व असम्भव है । जैसे, प्यासे हिरन को जब तक वास्तविक जल न मिलेगा, वह मरुस्थलीय मिथ्या-जल से विरक्त भी हो जाय तो प्यास से विरक्त नहीं हो सकता । अतएव ईश्वर-शरणागति तो करनी ही पड़ेगी । 

स्थूल दृष्टि से यहाँ समझ लीजिये कि यदि आप अपने घर जा रहे हैं एवं मार्ग भूल गये हों और एक व्यक्ति आपको यह समझा दे कि यह मार्ग आपके घर का नहीं हैं क्योंकि आपके घर के मार्ग में अमुक-अमुक पहिचान मिलती है, और आप समझ भी जायँ कि तुम ठीक कहते हो, मैं गलती पर था, किन्तु इतने जानने से आप घर न पहुँच सकेंगे । 'हमारा सांसारिक पदार्थों द्वारा वासना-पूर्ति का मार्ग गलत है', यह ज्ञान तो हो गया जिसके परिणामस्वरूप वैराग्य भी हो गया किन्तु फिर 'हमारे परमानन्द-स्वरूप ईश्वरीय घर का कौन सा मार्ग है' यह जानना होगा । इतना ही नहीं, उस मार्ग से चल कर घर भी पहुँचना होगा, तभी अभीष्ट सिद्धि होगी ।
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