प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 79)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 79) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

इन महापुरुषों की बात छोड़िये, हम आपको एक साधारण संसार की बात बताते हैं । देखिये, किसी सुन्दरी षोडशवर्षीय किशोरी के साथ एक पुरुष वर्षों रहे एवं दोनों ही एक मकान में रहें तो क्या यह संभव है कि एक दूसरे के प्रति काम-भाव न व्याप्त हो? जब कि न उस पुरुष  एवं न उस स्त्री के पति हो और न आगे ही होने की संभावना हो । आप कहेंगे, यह असंभव है । पर मैं कहता हूँ यह आप सब लोग करते हैं । आप हैरान होंगे, पर देखिये यदि वह 40 वर्ष का हो चुका है, वह विवाह नहीं करना चाहता एवं उसी की पुत्री वह सुंदरी है जिसका पति विवाह होने के बाद ही मर गया है । हिन्दू धर्म के अनुसार वह भी विवाह नहीं करना चाहती । किन्तु उन दोनों का परस्पर स्त्री-पति-भाव मन से भी नहीं होता । भले ही वह लड़की किसी पड़ोसी के लड़के का चिन्तन करे एवं पिता किसी नौकरानी का चिन्तन करे ।  यह सब कैसे हुआ ? सोचिये, कामदोष-युक्त पिता एवं पुत्री जब परस्पर काम रहित हैं, तब कामादि रहित महापुरुष आदि का प्रश्न ही पृथक् है ।

अब कर्म पर विचार किजिये । एक सुन्दरी स्त्री को जोर से चिपटाने पर पति कामासक्त हो गया । पिता ने भी जोर से विदाई के समय पुत्री को चिपटाया, पर वह नहीं हुआ । अब सोचिये, क्रिया एक है पर परिणाम भिन्न-भिन्न हैं । जब इस प्रकार एक संसारी जीव भी चिन्तन-शक्ति के द्वारा कर सकता है तो दिव्यशक्ति वालों के लिए क्या असंभव है ।

अब साधकों के सिद्धान्त से समझिये । एक कर्मयोगी साधक क्रिया करता हुआ भी गीतोक्त अर्जुन की भांति अकर्ता रहता है अर्थात् आसक्तिरहित कर्म का कोई फल नहीं भोगना पड़ता । यद्यपि देखने में हत्याएं कर रहा है, फिर भी अर्जुन को कोई दंड विधान नहीं है । फाँसी पर चढाने वाला जल्लाद राग-द्वेष-रहित है अतएव उसे न अशान्ति होती है, न क्रोध आता है, न दुःखी होता है । यह और भी नीचे के दर्जे का उदाहरण है ।

इस प्रकार जब कर्मयोगी की रीति से किये हुए कर्मों से ही कर्त्ता को कर्मफल नहीं भोगना पड़ता, वह अकर्ता ही माना जाता है, तब फिर कृतकृत्य एवं ईश्वर के द्वारा कराये हुए कर्म का कर्त्ता महापुरुष कैसे हो सकता है? यदि सरकारी कर्मचारी सरकार की आज्ञानुसार किसी डकैत को मार डालता है तो उसे पुरस्कार मिलता है, दंड नहीं मिलता क्योंकि उसके वह कार्य ही नहीं है, वह तो सरकारी कार्य है और सरकारी कार्य करने का उसका लक्ष्य है । अत: फिर कृतकृत्य एवं ईश्वर के द्वारा कराये हुए कर्म का कर्त्ता महापुरुष कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता ।
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