प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 58)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 58) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

संसार का स्वरूप (Contd.)
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सुख के माथे सिल परे नाम हिये ते जाय । 
बलिहारी वा दुःख की जो पल पल नाम रटाय ॥ 

अब आप समझ गये होंगे कि संसार के ऐश्वर्य कितने भयानक होते हैं, जिन्हें हम चाहा करते हैं और साथ में यह भी क्षणभंगुर कल्पना करते रहते हैं कि ईश्वर-प्राप्ति हो जाय तो अच्छा है । 

वास्तव में हमारा  विश्वास सा बन गया है कि संसार में सुख है, अभी नहीं मिला है किन्तु अब मिलने वाला है । बस, इसी आशावाद में अनन्त जन्म समाप्त हो गये एवं आगे पता नहीं उपर्युक्त सिद्धांत हमारा कब तक बना रहे । जरा सोचिये, संसार का सुख क्या है ? 

दो लड़के एक स्थान पर बैठे हैं, एक लड़की उधर से पानी भरने जा रही है । उसे देखकर एक लड़के ने संकल्प किया कि मैं उससे अवश्य विवाह करूंगा । दूसरे ने कहा 'अरे भाई, पता नहीं किसकी लड़की है, किस जाति की है, कैसा वर चाहती है, इत्यादि । इसके झगड़े में कौन पड़े ।' यह सोचकर दूसरा लड़का तो चैन से पढ़ने चला गया एवं प्रथम लड़के ने पता लगाना प्रारम्भ किया । पता लगा तब मैत्री स्थापित करने का प्रयत्न किया । इसी झगड़े में परीक्षा में भी अनुत्तीर्ण हो गया एवं वर्षों चिन्ताग्रस्त रहा । कल्पना कीजिये कि उसका प्रयत्न यदि सफल हुआ यानी विवाह हो गया तो वह प्रसन्न हुआ, अब बताइये कि वह प्रसन्न तो उस लड़की के देखने के पूर्व भी था, फिर बीच के वर्षों के समय में जो हानि एवं अप्रसन्नता रही, वह व्यर्थ ही में रही । जब कि दूसरा लड़का परीक्षा में भी पास हो गया एवं वर्षों की परेशानी से भी बच गया और विवाह उसका भी एक स्थान पर हो गया । तो हम स्वयं इच्छा बनाते हैं, पुन: वहीं पहुँच जाते हैं जहाँ  इच्छा बनाना प्रारंभ किया था । 

प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम् । (सूक्ति)

अर्थात् कीचड़ में पैर डालकर पुन: धोना और यह महसूस करना कि पैर साफ हो गये । साफ तो पहले भी थे, तुम्हीं ने तो कीचड में पैर डाला था । हम इच्छा बनाकर दुःखी होते हैं, पुन: उसकी पूर्ति में सुखी होते हैं और यदि कहीं इच्छा की पूर्ति न हुई, जैसा कि बहुधा होता है, तो उतना परिश्रम भी व्यर्थ, समय भी व्यर्थ एवं सारे जीवन उस असफलता में अशान्त रहते हैं । यह हमारा सांसारिक काल्पनिक सुख है । कोई भी व्यक्ति किसी भी इन्द्रिय-विषय की वासना बनाकर अनुभव करे एवं बिना बनाये अनुभव करे बस, स्वयं सब समझ में आ जायगा । अस्तु, संसार का वास्तविक स्वरूप समझ कर मनुष्य विरक्त होता है । विरक्ति का अर्थ भी कुछ गम्भीर होता है । 
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