प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 59)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 59) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
वैराग्य का स्वरूप
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प्राय: लोग राग शब्द का अर्थ प्यार ही करते हैं, पर ऐसा नहीं है, राग का अर्थ है, मन का लगाव, वह मन का लगाव प्यार से हो या खार से हो अर्थात् अनुकूल भाव या प्रतिकूल भाव, किसी भी भाव से मन की आसक्ति ही कहलाएगी और जब न अनुकूल भाव से आसक्ति हो और न प्रतिकूल भाव से आसक्ति हो तभी वैराग्य कहलायेगा ।
स्थूल बुद्धि से यों समझिये कि जब आप किसी प्रिय का चिन्तन करते हैं तो सदा सर्वत्र उसी में मन व्यस्त रहता है, 'यह कब मिलेगा, कैसे मिलेगा, कहाँ मिलेगा, बड़ा अच्छा आदमी है, हमारा हितैषी है, हमारा प्रेमी है', इत्यादि । ठीक इसी प्रकार, जिससे आपका द्वेष हो जाये, वहाँ भी सर्वदा मन व्यस्त रहता है कि वह कहाँ मिलेगा, कैसे मिलेगा, वह हमारा शत्रु है, अनिष्टकारी है, उसे मारना है, इत्यादि ।
उपर्युक्त रीति से प्यार एवं खार दोनों ही में एक सी स्थिति मन की रहती है । यही प्रमुख कारण है कि अनुकूलभाव से मन को श्यामसुन्दर से एक कर देने वाली गोपियों भी भगवत्-स्वरूपा बन गयीं एवं प्रतिकूल भाव से मन को श्यामसुन्दर में एक कर देने वाले कंसादिक भी भगवत्स्वरूप बन गये । वेदव्यास की उक्ति के अनुसार -
कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहार्दमेव च ।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ (भाग. 10-29-15)
अर्थात् काम से, क्रोध से, भय से, स्नेह से, जैसे-कैसे भी मन का लगाव भगवान् में हो जाय, बस, उसे भगवान् की प्राप्ति होती है । अब आप समझ गये होंगे कि संसार से वैराग्य करने में मन को राग-द्वेष-रहित करना होगा अर्थात् मन संसार से उदासीन हो जायगा, यथा -
कबिरा खड़ा बजार में, सबकी माँगे खैर ।
ना काहू सों दोस्ती, ना काहू सों बैर ॥ (कबीर)
बस, यही अवस्था वैराग्य की है । जैसे, एक माँ अपने खोये हुए पुत्र को मेले में ढूँढती है । वह रोती हुई अपने बच्चे को खोज रही है । उसे एक बच्चा पीछे से दिखाई पड़ा जिसके कपड़े, आयु, कद, जूते आदि उसी के बच्चे के समान थे । वह उसी बच्चे को अपना बच्चा समझ बैठी और 'बेटा-बेटा' कहकर दौड़ी । जब उसका मुख देखा तो वह उसका बेटा न था । बस, उसे उस बेटे से वैराग्य हो गया, अर्थात् वह माँ न तो उस बेटे को प्यार ही करती है कि हमारा बेटा नहीं मिला न सही, चलो इसी से प्यार करें और न तो शत्रुता ही करती है कि 'क्यों रे, मैंने तो सोचा था कि तू मेरा ही बेटा है, तू पराया क्यों हुआ? इत्यादि । बस, इसी अवस्था का नाम वैराग्य है ।
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