प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 67)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 67) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

यह तो आप जानते ही होंगे कि वास्तविक ईश्वरीय ज्ञान के पश्चात् अनन्तकाल तक कभी अज्ञान नहीं आ सकता तथा ईश्वरीय आनन्द पाने के पश्चात् अनन्तकाल तक दुःख का अधिकार नहीं हो सकता । वेद कहता है -

सदा पश्यन्ति सूरयः तद्विष्णो परमं पदम् अर्थात् वह सदा दिव्यानंद का अनुभव करता है । यदि वह ज्ञान या वह आनन्द पुन: छिन जाये तो उसके लिये 

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये । 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वत: ॥ (गीता 7-3)

के अनुसार, सहस्रों जन्म कौन प्रयत्न करे । जैसे गेहूँ, चावल का बीज आग में जल जाने पर यद्यपि लावा रूप में दीखता है किन्तु उसकी बीज शक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाती है, उसे कोई भी व्यक्ति किसी भी साधन से पुन: अंकुरित नहीं कर सकता, उसी प्रकार एक बार ईश्वर-प्राप्ति द्वारा मायानिवृत्ति होने पर पुन: माया या उसके विकार उस व्यक्ति पर कभी अधिकार नहीं कर सकते । यह शास्त्र-सम्मत एवं तर्कयुक्त सर्वमान्य सिद्धान्त है । तो अब इसी आधार पर विचार करना है कि हमारे इतिहास में माया का अभिनय किस प्रकार मायातीत महापुरुषों ने किया है । 

सर्वप्रथम, जिन्हें ब्रह्मांड का रचयिता एवं संहारकर्ता आदि कहा जाता है, उन्हीं को लीजिये । 'शिव विरंचि कहँ मोहई को है वपुरा आन' के प्रमाणानुसार ब्रह्मा एवं शंकर को भी माया मोहित कर लेती है । और स्पष्ट सुनना चाहें तो पुन: रामायण देखिये - 

नारद भव विरंचि सनकादि । जे मुनि नायक आतमवादी ॥ 
मोह न अंध कीन्ह कहु केही । को जग काम नचाव जेही ॥ 

अर्थात् ब्रह्मा, शंकरादि ऐसा कोई नहीं बचा जिसे मोह ने अंधा न बना दिया हो । 

इसी सिलसिले में एक बात और समझ लेना है कि महापुरुषों में भी दो प्रकार के महापुरुष होते हैं । एक तो वे जो अनादिकाल से अर्थात् सदा से मायातीत पुरुष ही रहे हैं, कभी भी मायाधीन नहीं थे । उन्हें ईश्वर का परिकर, पार्षद आदि कहते हैं । दूसरे वे जो अनादिकाल से मायाधीन रहे हैं किन्तु किसी गुरु की शरण में जाकर उनके द्वारा निर्दिष्ट पथ पर चलकर ईश्वर-प्राप्ति की और तब से अनन्तकाल लिये वे भी महापुरुष हो गये हैं । मैं प्रथम उन ब्रह्मवादियों का वर्णन कर रहा हूँ जिन्हें कभी भी मायाधीन नहीं रहना पड़ा, सदा से महापुरुष रहे हैं । उनको भी मोह आदि ने अंधा बना दिया । यह कैसे और क्यों ? यह एक गंभीर प्रश्न है । 
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