प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 76)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 76) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

इसके अतिरिक्त महापुरुष के पास ईश्वरीय शक्तियाँ होती हैं, भले ही उनका वह सर्वत्र, सर्वदा उपयोग न करे । उन शक्तियों के द्वारा ही वह मायिक कार्य करता हुआ अमायिक रहता है । देखिये, जेल में खड़े तीन व्यक्तियों को देखकर एक व्यक्ति ने प्रथम व्यक्ति से पूछा, आप यहाँ कैसे आये ? उसने कहा महाशयजी, जेल है, आप नहीं जानते कि यहाँ अपराधी अपराध का दण्ड भुगतने आते हैं ? अर्थात् मैं अपराधी कैदी हूँ ।

यह सुनकर उसने तीनों के विषय में निश्चय कर लिया । किन्तु, यह निश्चय तब गलत सिद्ध हो गया जब उसे यह ज्ञात हुआ कि एक सरकारी कर्मचारी जेलर है एवं एक स्वयं राजा है । यह सरकारी कर्मचारी जेलर कैदियों की देखबाल एवं सुधार का कार्य करता है तथा राजा भी यही कार्य करता है । जब कोई गंभीर समस्या आती है, तब राजा स्वयं जाया करता है, सर्वदा तो कर्मचारी ही रहते हैं ।

ये सरकारी कर्मचारी ही महापुरुष हैं जो कृतकृत्य होने पर अन्य जीवों को कृतकृत्य कराने के निमित्त इस संसार में रहते हैं, अवतार ले लेकर आया करते हैं, भले ही कैदी अर्थात् मायाबद्ध जीव उन्हें गालियाँ दिया करें । वह राजा ही स्वयं भगवान् हैं जो गंभीर परिस्तिथियों में जगत्कल्याण के निमित्त युग-युग में अवतार लेकर आते हैं ।

उपर्युक्त तीनों ही व्यक्ति संसार की जेल में दीखते हैं एवं तीनों के कर्म एक से दीखते हैं, किन्तु तीनों में महान अन्तर है । एक मायाधीन कैदी है, एक मायातीत महापुरुष सरकारी कर्मचारी है, एक मायाधीश सम्राट् स्वयं भगवान् हैं । अतएव सबके कर्म एक प्रकार के होते हुए भी उनमें महान अन्तर है । मायाधीन जीव माया के आधीन होकर कर्म करता है । मायातीत महापुरुष कुछ नहीं करता, उसके कार्य योगमाया के द्वारा स्वयं ईश्वर कराता है एवं मायाधीश भगवान् स्वयं योगमाया से कार्य करता है, जो देखने में मायिक होता है किन्तु उसका वास्तविक स्वरूप दिव्य होता है ।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत: ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ (गीता 4.9)
भक्त हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तन भूप ।
किये चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥ (रामायण)

अब आप समझ गये होंगे कि कर्मों में क्या अन्तर है ।
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