प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 80)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 80) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿
इतना अवश्य जान लेना चाहिये कि कामादि दोषों के रहते हुए कामादि दोष सम्बन्धी कर्म का अभिनय नहीं हो सकता । और यदि होता भी है तो किसी सीमा तक ही हो सकता है, किन्तु कामादि से परे महापुरुषों के अभिनय पूर्णतया दिव्य शक्ति से हो सकते हैं ।
यदि महापुरुष अपनी स्तिथि में ही रहे, अभिनय के शुभाशुभ कर्म कुछ भी न करे तो आपके समक्ष ही न आवे, आपका मार्ग-प्रदर्शन भी न करे एवं आपका कल्याण भी न हो । अतएव नित्यानन्दमय एवं नित्य ईश्वर से ऐक्य रखते हुए भी, बहिरंग जगत् के कल्याणार्थ कोई ग्रन्थ लिखता है, तो कोई अपदेश करता है, कोई प्रह्लाद आदि के समान हजारों वर्ष समस्त भूमंडल का राज्य करता है । किन्तु, इन कार्यों से उसकी पूर्णता में कोई बाधा नहीं होती क्योंकि वे कार्य ईश्वरीय होते हैं ।
आप यह आपत्ति कर सकते हैं कि महापुरुष एवं भगवान् को धर्म विपरीत कर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि
'महाजनो येन गत: स पन्था:' (महाभारत)
के अनुसार जीव तो उसी का अनुकरण करेंगे और परिणामस्वरूप उनका सर्वनाश हो जायगा । किन्तु यह कहना भोलापन है । ऐसा ही प्रश्न परीक्षित ने श्रीकृष्ण के बारें में किया था । थोड़ा इस विषय पर विचार कर लीजिये कि महाजनों का अनुकरण करना चाहिये या नहीं और यदि नहीं तो क्यों । और फिर किसका अनुकरण करना चाहिये, इत्यादि । वेद कहता है -
यान्यस्माकं सुचरितानि तान्येव त्वयोपास्यानि । (तैत्तिरीय उप. 1-11)
अर्थात् हमारे सुचरित ही आचरण में लाने चाहिए । साथ ही वेद पुन: कहता है, नो इतराणि, अन्य नहीं करना चाहिए । शुकदेव परमहंस परीक्षित को इसका कारण बताते हैं -
धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्
तेजसीयसां न दोषाय वह्ने: सर्वभुजो यथा ॥ (भाग. 10-33-30)
अर्थात् समर्थ पुरुषों के इतिहास में धर्मविरुद्ध आचरण देखा गया है किन्तु वह आचरण समर्थ होने के कारण अर्थात् ईश्वरीय होने के कारण दोषकारक नहीं है । जैसे, अग्नि को सब कुछ ग्रहण करने का अधिकार है, वह सर्वभुक् है, किन्तु अन्य को वह अधिकार नहीं । पुन: शुकदेव जी कहते हैं -
नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वर: ।
विनश्यत्याचरन् मौढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम् ॥ (भाग. 10-33-31)
यदि कोई अनधिकार चेष्टापूर्वक मन से भी उन महापुरुषों में दिखने वाले दुश्चरितों का आचरण करेगा तो उसका सर्वनाश हो जायगा । अतएव सबके लिये सब आचरण अनुकरणीय नहीं है । भगवान् शंकर हलाहल विष पी गये, वे नीलकंठ की उपाधि से विभूषित हुए एवं विशिष्ट सौंदर्य से सुशोभित हो गये किन्तु कोई नकल करके 2 तोले अफीम खा लेगा तो एक ही रिहर्सल (rehearsal) में महाप्रयाण करना पड़ेगा ।
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