प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 63)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 63) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

वैराग्य का स्वरूप (contd.)
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चिदानन्दमय देह तुम्हारी । विगत विकार जान अधिकारी । 

 के अनुसार उनकी देह दिव्य है । दिव्य देह को प्राकृत आँख कदापि नहीं देख सकती, फिर मन कैसे विभोर होगा ? आपने पढ़ा होगा, भागवत् में लिखा है कि जब श्रीकृष्ण-बलराम कंस की सभा में खड़े थे तब जनता के भिन्न-भिन्न भावानुसार, वे अनेक प्रकार के दिखाई पड़े -

मल्लानामशनिर्नृणां नरवर: स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान् । 
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वापित्रो: शिशु: ॥
मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां।
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रङ्गऺ गत: साग्रज:॥   (भाग. 10-43-17)

भावार्थ रामायण से समझ लीजिये । जब भगवान् राम जनक की सभा में खड़े थे तब भी जनता ने अपने-अपने दृष्टि-कोण से पृथक्-पृथक् देखा, सब विभोर नहीं हो गये । 

जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखि तिन तैसी ॥ 
विदुषन प्रभु विराटमय दीसा । बहु मुख कर पग लोचन सीसा ॥ 

अब आप सोचिये कि जब एक दर्शक विराट् रूप में देखकर डर रहा है तो सब विभोर कैसे होंगे? विभोर तो वे ही हुए जो अधिकारी थे, भक्त थे । बस, वे ही उन्हें देख सके । 

हरिभक्तन देखे दोउ भ्राता । इष्टदेव इव सब सुखदाता । 

अब आप समझ गये होंगे कि मन भगवान् में अपने आप अवतारकाल में भी नहीं लगेगा, फिर अवतारकाल न रहने पर तो प्रश्न ही नहीं पैदा होता । यदि मैं स्पष्ट कहूँ तो यह कह सकता हूँ कि यदि आप रामकृष्णादि भगवान् को समक्ष देख लें तो विभोर होने की बात तो दूर रही, शायद नास्तिक भी हो जायें, क्योंकि जब तक आप यह रहस्य न जान लें कि उनका वास्तविक रूप एवं कर्म दिव्य हैं तब तक प्राकृत दृष्टि में दीखने वाले प्राकृत शरीर एवं प्राकृत कर्म में कैसे ईश्वरीय भावना बना सकेंगे? अस्तु, हमें किसी पथ प्रदर्शक की आवश्यकता होगी । 
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