प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 78)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 78) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿
अब मैं आपको अन्य धर्मावलम्बियों के सिद्धान्त बताता हूँ । मौलाना जलालुद्दीन रूमी एक बहुत बड़े मुस्लिम फकीर हो गये हैं । उन्होंने अपनी मसनबी (भाग 1 कथा 12) ग्रंथ में लिखा है कि फकीरों के लिए कयामत के दिन कारनामों की किताब नहीं देखी जाती अर्थात् उनके द्वारा हुए शुभाशुभ कर्म नहीं देखे जाते क्योंकि वे कुछ करते ही नहीं हैं, केवल कर्म दिखायी पड़ते हैं । पुन: आर॰ ए॰ निकल्सन, 'इस्लाम के रहस्यवाद' के लेखक ने अपने (दीवाने शमसे तब्रीज) ग्रन्थ में लिखा है कि फकीर की खुदा से एकता हो जाने के कारण उसके द्वारा सम्पादित कार्य उसके नहीं होते, वे कार्य तो खुदाई होते हैं, अर्थात् ईश्वर करता है अतएव वे उस झगड़े से पृथक् हैं ।
भावार्थ यह निकला कि भीतर से महापुरुष होते हुए भी उनके द्वारा प्राकृत कार्य दीखते हैं जैसा कि पूर्वपक्ष में शंकरादिकों के विषय में बताया । किन्तु एक बात ध्यान में रखने की है कि पूर्वपक्ष में रखे गये समस्त महापुरुष अवतारी महापुरुष हैं । अवतारी महापुरुषों के कार्य तो ईश्वर के द्वारा होते ही हैं, साथ ही स्पष्ट कर दिये जाते हैं । ये लोक में माया का कार्य अभिनय रूप से इसलिये करते हैं कि जीव उससे शिक्षा ले एवं अनधिकारचेष्टा द्वारा ईश्वरीय कार्यों में मायिक-बुद्धि लगाकर ईश्वर से विमुख न हो जाय । देखिये, जिन पार्वतीजी को माया लगी बताया गया है, उन्हीं के विषय में शंकरजी स्पष्ट कहते हैं -
राम कृपा पारवति सपनेहुँ तव मन माहिं ।
शोक मोह सन्देह भ्रम मम विचार कछु नाहिं ॥
तदपि आशंका कीन्हेउ जोई । कहत सुनत सब कर हित होई ॥ (रामायण)
अर्थात् पार्वतीजी ! तुम्हें न शंका है, न माया है, न अज्ञान ही आ सकता है, किन्तु फिर भी जो तुमने शंका का नाटक किया है उसका अभिप्राय केवल यह है कि जीव सावधान हो जायें एवं ईश्वरीय अचिन्त्य कार्यों में प्राकृत तर्क द्वारा अपना सर्वनाश न करें ।
पुनश्च, जब गरुड़जी काकभुशुंडि के पास गये तो प्रथम काकभुशुंडि ने भी यही कहा कि -
तुम्हहिं न संशय मोह न माया । मोपर नाथ कीन्ह तुम दाया ॥ (रामायण)
अर्थात् तुम्हें न शंका है, न अज्ञान, न माया है, मेरे ऊपर कृपा करने आये हो । पश्चात् भी इसी प्रकार की बात कही है, समस्त प्रकरणों में उसको पढ़ लेना ।
जैसे पिक्चर में कई एक्टर (actor) एवं ऐक्ट्रेस (actress) पार्ट (part) करने वाले होते हैं तब पिक्चर बनती है, वैसे ही जब भगवान् अवतार लेकर लीला करने आते हैं तो उनके परिकर भी आते हैं एवं शंका तथा समाधान दोनों पक्षों का अभिनय जीव-कल्याणार्थ करते हैं, जिसे भगवत्कृपा-पात्र जीव ही समझ पाते हैं ।
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