प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 70)

✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 70) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष🌿

इस प्रकार सीताराम की माँ पार्वतीजी हो ही चुकीं और इधर भगवान् शंकर कहते हैं कि तुमने कुछ क्षण को सीता का वेश बनाया अतएव हम तुम्हारा परित्याग करेंगे । जब पार्वतीजी पूर्व में ही माँ बनकर वरदान दे रही हैं तब तो परित्याग नहीं किया किन्तु अब क्यों किया? फिर जिस शरीर से राम की अर्धांगिनी सीता बनीं थीं, वह योगमाया का देह था, उसे तो बदल कर पुन: शंकरजी के पास गयीं । भावार्थ यह कि शंकरजी के माँ बाप सीता राम हैं एवं राम के माँ बाप शंकर पार्वती हैं । किन्तु भगवान् राम इस नियम के अनुसार सीताजी का परित्याग नहीं करते । अस्तु, यह पार्वतीजी की माया लगी अवस्था है । पश्चात् उन्होंने शरीर त्याग दिया, पुन: घोर तप किया, तब शंकरजी ने अपनाया सर्वविदित है ।

भगवान् के नित्य वाहन, ज्ञानियों एवं भक्तों के शिरोमणि गरुड़जी महाराज को भी माया लग गयी -

ज्ञानी भक्त शिरोमणि त्रिभुवनपति कर यान ।
ताहि मोह माया प्रबल पामर करहिं गुमान ॥ (रामायण)

जरा इस पर विचार कीजिये कि ज्ञानी को ही अज्ञान नहीं आ सकता, फिर ज्ञानी-भक्त-शिरोमणि एवं भगवान् के सनातन वाहन गरुड़जी हैं । जब से भगवान् हैं, तब से गरुड़ हैं । उनको भी माया लग गयी । और माया क्यों लगी, यह सुनकर आप चकित हो जायेंगे -

भव बंधन ते छूटई नर जपि जाकर नाम ।
खर्व निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम ॥

इस रामायण की उक्ति के अनुसार, नागपाश में बँधे हुए लीलाधारी भगवान् राम को देखकर शंका हो गई । ये भगवान् नहीं हो सकते, क्योंकि जिसके 'नाम' में यह शक्ति है कि अनादिकालीन अकाट्य कर्मबंधनों को निर्मूल कर दे, वह स्वयं भला कैसे बन्धन में बँध सकता है । अस्तु, माया के चक्कर में गरुड़जी ने नारदादिकों के पास चक्कर लगाया, भगवान् शंकर के पास भी गये किन्तु उन्होंने कोरा उत्तर दे दिया -

महा मोह उपजा उर तोरे । मिटइ न वेगि कहे खग मोरे ।

अर्थात् तुमको महान अज्ञान ने दर दबाया है, अतएव शीघ्र निवारण नहीं हो सकता । तुम कागभुशुंडि के पास जाओ, कुछ दिन सत्संग करो । अस्तु, गरुड़जी कागभुशुंडि के पास गये, तब कागभुशुंडि ने कहा कि अरे भाई, तुमको माया लग गई तो क्या बात है, बड़े-बड़े ब्रह्मा शंकरादिकों को भी माया लग जाती है ।

तुम निज मोह कही खग साईं । सो नहिं कछु आचरज गुसाईं ॥
नारद भव विरंचि सनकादी । जे मुनि नायक आतम वादी ॥
मोह न अंध कीन्ह कहु केहि । को जग काम नचाव न जेही ॥
✨✨✨✨✨✨✨✨✨

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 55)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 81)