प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 73)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 73) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

मैंने इनकी चरणधूलि पाने के लिए साठ हजार वर्ष तप किया, फिर भी नहीं पा सका ।

षष्ठिवर्षसहस्त्राणि मया तप्तं तप: पुरा ।
नन्दगोपब्रजस्त्रीणां पादरेणूपलब्धये ।
तथापि न मया प्राप्तास्तासां वै पादरेणव: ।
                         (वृहद्वामन पुराण)

उन गोपों एवं गोपियों के सन्तानोत्पत्ति हो रही है । भला सोचिये, कामरहित महापुरुष से रज-वीर्य द्वारा सन्तानोत्पत्ति कैसे होगी ? आप हैरान हो गये होंगे । गीता-ज्ञानी-महापुरुष अर्जुन की नाग-कन्यादिकों में आसक्ति हो रही है, इतना ही नहीं, पुत्रोत्पत्ति भी हो रही है । पाण्डवों का इतिहास कितना आश्चर्यजनक है कि पाँच पांडव पाँच पिता से हुए अर्थात् इन्द्र से अर्जुन, वायु से भीम, अश्विनीकुमारों से नकुल और सहदेव एवं धर्मराज से युधिष्ठिर । पुन: इन पाँचों ने एक द्रौपदी को स्वीकार किया, उसे अपनी स्त्री बना लिया । इतना ही नहीं, भीमसेन ने राक्षसी हिडिम्बा से सम्बन्ध किया और घटोत्कच पुत्र हुआ । अच्छा, जरा अर्जुन के इतिहास पर विचार कीजिये । बनवास के पश्चात् जब महाभारत का युद्ध होने जा रहा था, अर्जुन एवं दुर्योधन दोनों ही द्वारिका में भगवान् के पास गये । दोनों के प्रसादनार्थ भगवान् ने शर्त रख दी कि एक ओर मैं नि:शस्त्र रहूँगा एवं दूसरी ओर 18 अक्षौहिणी सेना सशस्त्र रहेगी, आप लोग चुन लीजिये । उस समय अर्जुन ने शस्त्रहीन श्रीकृष्ण को स्वीकार किया । जरा सोचिये कि यदि अर्जुन यह न जानते होते कि श्रीकृष्ण भगवान् हैं तो लड़ाई के मैदान में क्या उनकी पूजा करनी थी जो श्रीकृष्ण को चुन लेते ? यानी पहले ज्ञान था, पश्चात् रण क्षेत्र में यह अज्ञान आ गया कि हम गुरुजनों को कैसे मारें, जबकि यह पूर्व में ही ज्ञात था कि हमारे शत्रु अमुक-अमुक हैं, पश्चात् गीता ज्ञान हुआ, जब कि इन सब कार्यों के पूर्व ही नर रूप में पूर्व जन्म में ही महापुरुष हो चुका था ।

उपर्युक्त सभी महापुरुषों के बहिरंग व्यवहार संसारी व्यक्ति की भाँती हैं, जबकि वे मायातीत, निर्ग्रन्थ महापुरुष हैं । एक साधारण व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि मायातीत महापुरुष मायिक कार्य कैसे कर सकता है । वह यह तो समझता है कि महापुरुष शुभ कर्म कर सकता है किन्तु यह नहीं समझ पाता कि अशुभ कर्म भी कर सकता है ।
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