प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 69)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 69) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

अस्तु, पार्वतीजी ने शंका की कि एक तो निराकार भगवान् देह नहीं धारण कर सकता, दूसरे उसे वियोग या योग का रोग नहीं लग सकता । अतएव राम भगवान् नहीं हो सकते । पुन: सोचती है, "लेकिन भगवान् शंकर तो सर्वज्ञ हैं, भला उनकी वाणी मिथ्या कैसे हो सकती है ?' - 

'शंभु गिरा पुनि मृषा न होई । शिव सर्वज्ञ जान सब कोई ' ॥ 

अब यह देखिये कि सर्वज्ञ शब्द का प्रयोग वेदों में भगवान् के लिए ही हुआ है -

य: सर्वज्ञ: सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप: । 
तस्मादेतद्ब्रह्मा नाम रूपमन्नं च जायते ॥ (मुण्डको. 1-1-9)

भावार्थ यह कि पार्वतीजी शंकर जी को सर्वज्ञ भगवान् भी मानती हैं और कहती हैं कि उनकी सर्वज्ञता को सब जानते हैं किन्तु फिर भी पार्वतीजी को उनमें शंका हो रही है । वे सीताजी का रूप बनाकर भगवान् की परीक्षा लेने गयीं । सीताजी के वेष में बैठी हुई पार्वतीजी को देखकर अभिनेता सर्वज्ञ भगवान् राम ने सर्वान्तर्यामी होने के कारण रोने का अभिनय समाप्त कर दिया और बोले 'माँ! अकेली कैसे बैठी हो? पिता जी यानि शंकर जी कहाँ हैं?' शंकरजी को लीला-विग्रह में भगवान् राम इष्टदेव मानते हैं, उस नाते शंकरजी पिता हुए और पार्वतीजी माँ हुईं । 

अस्तु, परीक्षा समाप्त हो गयी, वह चाहे विद्यार्थी की हुई हो या प्रोफेसर (professor) की हुई हो । पार्वतीजी लौटकर शंकरजी के पास गयीं । शंकरजी ने पूछा कि कहो पार्वती कुछ परीक्षा ली ? अब देखिये, भगवान् शंकर को सर्वज्ञ एवं जगदीश माननेवाली तथा राम को परीक्षा द्वारा सर्वान्तर्यामी मान लेने वाली पुन: सफेद झूट बोल रही हैं -

कछु न परीक्षा लीन गुसाईं । कीन प्रणाम तुम्हारिहि नांईं ॥ 

अर्थात् मैंने कोई परीक्षा नहीं ली, केवल तुम्हारी तरह ही प्रणाम कर लिया है । पुन: शंकरजी ने पार्वतीजी का परित्याग कर दिया, कारण यह बताया कि तुमने मेरी माँ का रूप धारण किया था, अतएव तुम हमारी अर्धांगिनी इस शरीर से नहीं हो सकतीं । यहाँ पर एक बात तो यह विचारणीय है कि विवाह के पूर्व ही सीताजी ने पार्वतीजी की उपासना माँ मानकर की थी और पार्वतीजी ने वरदान भी दिया था -

'मन जाहि राँच्यो मिलइ सो वर सहज सुन्दर साँवरो।'
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