प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 60)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 60) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

वैराग्य का स्वरूप (contd.)
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जैसे, किसी शराबी को शराब के लिये मदिरालय जाना पड़ता है किन्तु मदिरालय के पूर्व कई दुकानें अन्य सामानों की पड़ती हैं । वह उन दुकानों के सामने से तो जाता है, देखता भी जाता है, किन्तु विरक्त है । अर्थात् न तो किसी दुकान पर खड़ा होता है कि चलो मदिरा न सही, इस दुकान पर रसगुल्ला ही खा लें और न तो झगड़ा ही करता है कि 'मुझे तो मदिरा चाहिये, तू रसगुल्ला की दुकान क्यों बीच में लगाये बैठा है', इत्यादि।  वह सबसे विरक्त होकर अपने मदिरालय के लक्ष्य पर जा रहा है । बस, यही वैराग्य है । इस संसार में सब दुकानों से गुजरता हुआ अपने परमानन्द के केंद्र भगवान् की दुकान पर ही सीधा जाय, अन्यत्र कहीं भी न राग हो न द्वेष हो ।

यह ध्यान रहे कि जब तक मन ईश्वर के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी राग या द्वेष युक्त (आसक्त) रहेगा, तब तक ईश्वर-शरणागति असम्भव है और जब तक संसार में, 'न तो यहाँ हमारा आध्यात्मिक सुख है और न यहाँ हमें बरबस अशान्त करने वाला दुःख ही है', ऐसा ज्ञान परिपक्व न होगा, तब तक वैराग्य भी असम्भव है ।

इस परिपक्वता के लिये संसार के स्वरूप पर गम्भीर विचार एवं बार-बार विचार करना होगा, बार-बार विचार से ही दृढ़ता आयेगी । एक बार विचार करने मात्र से काम नहीं बनेगा क्योंकि अनन्तानन्त जन्मों का विपरीत विचार संगृहीत है । उसे काटने के लिए -

जन्म मृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ।  (गीता 13-8)

अर्थात् बार-बार विचार करना होगा तब मन खाली हो जायगा । अब आप समझ गये होंगे कि उस विरक्त मन को ईश्वर के शरणागत करना है, जिस शरणागति के परिणाम स्वरूप, ईश्वर-कृपा के परिणाम स्वरूप ईश्वरीय-ज्ञान एवं ईश्वरीय दिव्यानन्द की प्राप्ति होती है ।
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