प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 75)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 75) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿
देखो अगर मोटर से किसी का एक्सीडेन्ट (accident) हो जाता है मोटर को दोषी कोई नहीं ठहराता, क्योंकि मोटर तो स्वयं चलती ही नहीं, वह तो जड़ वस्तु है, उसका चालक ही दोषी है । अतएव उसी को दण्ड मिलता है । उसी प्रकार जब तक जीव शरणागत नहीं हुआ था तब तक स्वयं कर्म का कर्त्ता था, जब शरणागत हो गया तो कर्त्ता नहीं रहा । वास्तव में, कुछ न करना ही तो शरणागति करना होता है । अब महापुरुष तो मोटर के समान जड़ सा हो गया ।
अब तो -
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ (गीता 9.22)
इस गीतोक्ति के अनुसार उसके संचालक (योगक्षेम-वहनकर्त्ता) स्वयं ईश्वर हो जाते हैं अतएव उनके द्वारा कर्म कराया जाता है । महापुरुष तो एक मशीन की तरह शरणागत-मात्र रह कर ब्रह्म की गोद में निर्भयतापूर्वक आनन्दरस का पान करता है ।
चौथी बात यह भी है कि कर्म तो इच्छायुक्त हुआ करते हैं । काम या इच्छा के बिना कर्म का स्वरूप ही नहीं बनता । जब महापुरुष पूर्णकाम हो गया तो काम अर्थात् इच्छा ही समाप्त हो गयी, तब कर्म कैसे करेगा, आप लोग जो यह वाक्य सुना करते हैं कि -
'जो करै सो हरि करै' (कबीर)
इसका यही आशय है कि जब तक हम करते हैं तब तक हरि हमारा कर्म नहीं करते एवं तभी तक हम फल भी भोगते हैं । जब हम शरणागत हो जाते हैं अर्थात् कुछ नहीं करते हैं तब वे ही सब कुछ करते हैं । वैसे तो ईश्वर समदर्शी साक्षी बन कर सभी जीवों के कर्मों को नोट करता है किन्तु कर्म का फल मात्र ही देता है और जब जीव शरणागत हो जाता है तब तो भगवान् कृपालु बन जाता है एवं उसमें पूर्णतया संचालक बन कर निवास करता है । बस, उसी सौभाग्यशाली क्षण से जीव सदा के लिए कामनाओं एवं तत्सम्बन्धी कर्मों से अवकाश प्राप्त कर लेता है । इसी आशय से गीता में कहा है -
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रिय: ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ (गीता 9.29)
और चूँकि शरणागत कुछ करता ही नहीं, शरणागत मात्र रहता है इसलिए भगवान् बड़े दावे के साथ कहते हैं कि -
'कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति ।' (गीता 9.31)
अर्थात् अर्जुन ! मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मेरे भक्त का पतन नहीं हो सकता । पतन या उत्थान का प्रश्न तो तब पैदा हो जब पतन या उत्थान सम्बन्धी कुछ कर्म करे । वह तो अकर्ता हो गया ।
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