प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 64)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 64) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿

वैराग्य के पश्चात् एवं ईश्वर-शरणागति के पूर्व एक तत्त्व मध्य में है, जिसके बिना कार्य नहीं सम्पादित हो सकता । उस तत्त्व का नाम श्रोत्रियब्रह्मनिष्ठ महापुरुष है । ईश्वर-शरणागति में कौन सा मार्ग किस साधक के लिये श्रेयस्कर होगा, इसका निर्णय वही महापुरष करेगा । एवं मध्य में भी जो अड़चनें साधक को मिलेंगी, उनका समाधान भी वही महापुरुष करेगा । केवल वैराग्य से ईश्वर की प्राप्ति की समस्या नहीं हल हो सकती । 

आचार्यवान् पुरुषो हि वेद। (छान्दोग्यो. 6-14-2)

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृत: कृतेन। 
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ (मुण्डको. 1-2-12)

अर्थात् कर्म कर-कर के विद्वान लोग परीक्षा कर चुके हैं कि उनसे कर्मबन्धन का अत्यन्ताभाव नहीं होता अपितु कर्मबन्धन की ही वृद्धि होती है । अतएव उस ईश्वर को जानने वाले एवं अनुभव करने वाले एक गुरु की आवश्यकता है । 

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । 
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन: ॥ (गीता 4-34)

अर्थात् उस ईश्वर तत्त्व को जानने के लिए श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की आवश्यकता है,  जिसके शरण होकर सेवापूर्वक जिज्ञासु बनकर ही परमतत्त्व का ज्ञान प्राप्त हो सकता है । वेदव्यास भी कहते हैं -

तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासु: श्रेय उत्तमम् । 
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ (भाग. 11-3-21)

अर्थात् उस ईश्वर की प्राप्ति के लिए वास्तविक गुरु की शरण में जाना होगा । रामायण कहती है - 'गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई', 'गुरु बिनु होई कि ज्ञान' । भावार्थ यह कि सर्वसम्मत-मत यही है कि बिना गुरु के अज्ञेय-तत्व को नहीं जाना जा सकता । अतएव अब हमें सर्वप्रथम उसी महापुरुष-तत्त्व पर विचार करना है । 
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